'ओए सरदार ! 12 बज गए', जानें सरदारों का '12 बजने' से संबंध

सरदारों का '12 बजने' से क्या है संबंध ? आइये जानते हैं इस रिपोर्ट में।

'ओए सरदार ! 12 बज गए', जानें सरदारों का '12 बजने' से संबंध
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'ओये सरदार! 12 बज गए।' आपने भी कहीं ना कहीं, कभी ना कभी तो यह शब्द सुने होंगे। अक्सर आपने कुछ लोगों को यह कहते सुना होगा कि सरदारों का दिमाग 12 बजे खराब हो जाता है। परंतु क्या है इसके पीछे की कहानी? क्या रिश्ता है 12 बजे का सरदारों से?
आइये, हम आपको बताते हैं सरदारों का '12 बजे' से क्या रिश्ता है, जिसे जानकर आप गर्व करेंगे अपने सरदार भाइयों और सिक्ख समुदाय पर।

17 वी शताब्दी में जब हिन्दुओं पर होते थे अत्याचार

17 वी शताब्दी में जब हिन्दुओं पर होते थे अत्याचार

17 वी शताब्दी की शुरुआत में भारत वासियों पर अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था। मुग़लों व अन्य ईरानी लुटेरों के द्वारा उत्तर भारत के क्षेत्रों में लूटमार, हत्या व बलात्कार आम बात हो गई थी। भारतीयों की ज़िन्दगी उस समय बद्तर हालात में पहुँच चुकी थी।

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खालसा की स्थापना

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ऐसे मुश्किल समय में सिक्खों के 10 वे गुरु, गुरु गोविन्द सिंह जी नें अपने साथी सिक्खों के साथ मिलकर एक ऐसे समूह की स्थापना करने की ठानी जो किसी से ना छुपेगा और ना ही डरेगा। इसके साथ ही उन्होनें मुग़लों व अन्य लुटेरों के अत्याचार से भारतीयों को बचाने के लिए लोहा लेना शुरू कर दिया।

नादिर शाह का हमला

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सन 1739 में नादिर शाह नें भारत पर हमला कर दिया और बड़ी मात्रा में खजाने के साथ ही करीब 2200 भारतीय महिलाओं को बंदी बना कर अपने साथ ले जाने लगा।

पहली बार '12 बजे' सरदारों के

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नादिर शाह के इस हमले की खबर सरदार जस्सा सिंह के पास पहुंची। वे उस समय सिक्ख सेना के सेनापति थे। उन्होनें भारतीय महिलाओं की इज्जत बचाने के खातिर नादिर शाह के लुटेरों पर हमला करने की ठानी। रात के ठीक 12 बजे सरदार जस्सा सिंह की अगुवाई में सरदारों के एक छोटे परन्तु जांबाज़ दल नें लुटेरों के काफिले में हमला कर दिया। सरदारों की वीरता के आगे लुटेरे टिक ना सके। सभी महिलाओं को कैद से आज़ाद कर सुरक्षित घर पहुंचा दिया गया।

इसके बाद चल पड़ा यह सिलसिला

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इस घटना के बाद भारत पर कई अन्य ईरानी व अरबी लुटेरों ने हमले किये। हर बार जब भी ऐसा कोई हमला होता तो सरदारों की टोली मध्यरात्रि 12 बजे हमला कर लुटेरों को मार गिराती और भारतीयों के हितों की रक्षा करती। धीरे-धीरे वक़्त बीतता गया। परंतु जब भी भारत वर्ष को जरुरत पड़ी है सरदारों नें अपनी जान कुर्बान करते हुए इस मिट्टी की लाज रखी है

समय के साथ खो गई वीर गाथा

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वक्त बदलता चला गया और हम आधुनिक दौर में पहुँच गए। जो लोग सरदारों की ताकत से डरते थे या उनसे नफरत करते थे उनके द्वारा यह बात फैला दी गई कि 12 बजे सरदारों का दिमाग खराब हो जाता है। जबकि सच्चाई तो कुछ और ही थी। इन बातों पर आप और हम जैसे लोग विश्वास करने लगे और यह वीर गाथा महज एक मजाक बन कर रह गई। विडंबना तो यह है कि, जिस बात के लिए हमें सरदारों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, आज उसी बात के लिए लोग उनका मजाक उड़ाते फिरते है।

इसे देख जान जाएंगे पूरा सच:

आज सच्चाई जानने के बाद मुझे उम्मीद है कि बदलाव आएगा। अब शायद 12 बजते ही लोग कहेंगे "ओये सरदार ! 12 बज गए। हमें तुझ पर गर्व है।"