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लाशों के ढेर में खड़ा है चीनी इतिहास, यह शख्स है जिम्मेदार 

1 अक्टूबर 1945 को हुई थी कम्युनिस्ट पार्टी के जीत की घोषणा, जानें कितनी कितनी लाशों के ऊपर बसा यह साम्राज्य। 

लाशों के ढेर में खड़ा है चीनी इतिहास, यह शख्स है जिम्मेदार 
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इस बात से काफी लोग वाकिफ़ हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विश्वभर में कुल 5.5 करोड़ लोगों नें अपनी जान गँवाई थी। परंतु आप यह जानकर हैरान रह जायेंगे कि अकेले चीन में ही साम्यवादी पार्टी के उदय के दौरान कुल 4.5 करोड़ लोगों की मौतें हुई थी।
चीन में उस समय को सामजिक/साम्यवादी परिवर्तन के रूप में देखा जाता है। परंतु चीन के लोगों को इस बदलाव के दौरान काफी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।
आइये जानते हैं कौन था वह शख़्स और किस बर्बरता से किया उसने मानवता के इतिहास को शर्मसार।

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माओ ज़ेडोंग/ माओ से-सुंग / चेयरमैन माओ

माओ ज़ेडोंग/ माओ से-सुंग / चेयरमैन माओ

चेयरमैन माओ के नाम से मशहूर माओ ज़ेडोंग एक चीनी साम्यवादी क्रांतिकारी थे। इन्हें 'पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ इंडिया' के जनक के रूप में जाना जाता है। माओ ज़ेडोंग सन 1949 में चीनी साम्यवादी पार्टी के उदय से लेकर अपनी मृत्यु (सन 1976) तक पार्टी के चेयरमैन पद पर काबिज़ रहे थे। परंतु इसके अलावा उन्हें मानवता इतिहास के सबसे बड़े हत्यारे के रूप में भी देखा जाता है।

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विश्व इतिहास का सबसे विनाशकारी शख़्स

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कुछ इतिहासकारियों के विश्लेषण के अनुसार माओ को विश्व इतिहास का सबसे विनाशकारी शख्स क़रार दिया गया है। माओ नें सन 1958 में पश्चिम की अर्थव्यवस्था से आगे निकलने की होड़ में जो क्रूर कदम उठाये थे उन्हें जानकर बेशक ही आपके भी रोंगटे खड़े हो जायेंगे।

जब चीन में चली थी साम्यवादी लहर

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चीन में साम्यवादिता के उदय के साथ ही माओ ज़ेडोंग का इतिहास शुरू होता है। पश्चिम के देशों की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को टक्कर देने के लिए माओ नें एक ऐसी मशाल जलाई जिसके ईंधन के रूप में आम चीनी नागरिक के लहू का इस्तेमाल किया गया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बराबर मौते हुई थी अकेले चीन में

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चीन के इतिहास पर ख़ास अध्ययन कर चुके इतिहासकार फ्रैंक नें अपनी किताब में लिखा है कि द्वितीय विश्व युद्ध में हुई 5.5 करोड़ मौतों के मुकाबले चीन में सन 1958 से 1962 के बीच महज 4 सालों में कुल 4.5 करोड़ मौतें हुई हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार दरअसल यह संख्या 7 करोड़ से भी अधिक है।

भूख से तड़प कर सो गए कई गांव

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चीनी साम्यवादी आंदोलन के दौरान अधिकतर मौते भूख की वजह से हुई थी। चीन में लगभग एक तिहाई गांवों को निर्यात करने योग्य अनाज पैदा करने के नाम पर उजाड़ दिया गया था जिससे लोग भूखे मरने के लिए मजबूर हो गए थे। एक अनुमान के मुताबिक़ चीन में इस दौरान हुई कुल मौतों में से 50 प्रतिशत मौतें भूख की वजह से हुई थी।

लोगों को सहनी पड़ी थी कई यातनाएं

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माओ के साम्यवादी चीन बनाने के दौरान लोगों को कई यातनाओं का भी सामना करना पड़ा था। कई चीनी लोगों नें मजदूरी करते हुए ही अपने प्राण त्याग दिए थे। तानाशाही का आलम यहां तक बढ़ चुका था कि छोटी सी गलती की सजा भी काफी भयानक व जानलेवा हो चुकी थी। कहा जाता है कि लोगों के द्वारा मजदूरी के दौरान गलतियां किये जाने पर उन्हें ठण्ड के दिनों में बगैर कपड़ों के काम करने के लिए मजबूर किया जाता था।

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विरोध करने पर होता था बुरा अंजाम

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माओ के तानाशाह का आलम यह था कि जिस किसी नें भी चेयरमैन माओ या साम्यवादी पार्टी के खिलाफ जाने की कोशिश की थी उन्हें बेहद ही खतरनाक मौत का सामना करना पड़ा था। अपने विरोधियों के हौसले तोड़ने के लिए माओ उन्हें ज़िंदा दफ़न कर मौत देने जैसे क्रूर तरीके अपनाने से भी नहीं चूकते थे।

माओ व अन्य तानाशाहों के बीच एक तुलना

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हिटलर व स्टालिन भी रह गए पीछे

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यदि माओ ज़ेडोंग के द्वारा की गई कुल प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष हत्याओं के आंकड़ों पर एक नजर डाली जाए तो कहा जा सकता है कि चेयरमैन माओ इतिहास के सबसे क्रूर तानाशाह माने जाने वाले हिटलर व स्टालिन से कहीं आगे निकल चुके थे। हालांकि माओ नें हिटलर व स्टालिन की तरह सीधे तौर पर उतनी अधिक जानें नहीं ली हैं परंतु फिर भी उनके नाम इन दोनों कुख्यात तानाशाहों से कहीं अधिक हत्याएं दर्ज हैं।

इतिहास में कहीं गुम हो गई ये घटनाएं

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आज जब भी इतिहास के सबसे क्रूर तानाशाहों के बारे में बात की जाती है तो "चेयरमैन माओ" का नाम हिटलर, मुसोलिनी व स्टालिन के नामों के बीच कहीं छिप सा जाता है। यही वजह की कई लोग आज भी इस क्रूर तानाशाह से वाकिफ नहीं हैं।

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