हाँ! मेरी बेटी वेश्या है और मुझे उस पर नाज़ है

समाज का असली चेहरा एक माँ की जुबानी।

हाँ! मेरी बेटी वेश्या है और मुझे उस पर नाज़ है
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एक लड़की क्या होती है ? क्या भारत में लड़की होना एक अभिशाप है ?

उसके पैदा होने पर ख़ुशी कम थी। आखिर वो एक लड़की थी। घरवालों ने चाहा था बेटा, लेकिन बेटी हो गई। समाज ने उस समय भी किये थे उस पर अत्याचार लेकिन वो नादान थी हँसती । माँ के आँचल पर चैन से सोती वो नन्ही सी परी आज बड़ी हो गई। आज भी समाज उसको रोज़ तकलीफ़ देता है, पर अब उसकी "हँसी" कहीं  छुप सी गई है। और यह बात सिर्फ एक "माँ" समझती है। तभी तो आज एक माँ दर्द भरी आवाज़ में समाज को चीख-चीख कर कह रही है। हाँ! मेरी बेटी वेश्या है, और मुझे उस पर नाज़ है।

अजीब विडंबना है इस देश की यहाँ एक तरफ़ तो नारी को "दुर्गा" का अवतार माना जाता है। उनकी पूजा की जाती है। वहीं दूसरी ओर उनका अपमान करने में भी कोई पीछे नहीं रहता। कब तक ऐसे ही "निर्भया" की बलि चढ़ती रहेगी? कब तक? यहाँ निर्भया के दुःख पर साथ देने वाले बहुत हैं। लेकिन निर्भया को अपनाने वाला कोई नहीं। क्यों कोई उस समाज का हिस्सा बनना चाहेगा जहाँ स्त्री और पुरुष को समानता की नज़र से नहीं देखा जाता हो? मैं ऐसे समाज और लोगों का बहिष्कार करता हूँ, जहाँ नारी के मानवीय अधिकारों की अवहेलना की जाती है।

आज एक माँ का दर्द आपसे बयाँ कर रहा हूँ। वो माँ जो 9 महीने तक कोख में अपने बच्चे को पालती है। बिना भेदभाव किये, बिना जाने की वो लड़का है या लड़की। वो माँ जो अपने बच्चों की खुशियों के लिए खुद की खुशियों को भी कुर्बान कर देती है। लेकिन आज वो माँ दुखी है और नाराज़ भी। जब भी उसकी बेटी घर से बाहर निकलती है। हर बार उसको समाज का सामना करना पड़ता है। लेकिन इस बार वो समाज से हार गई है। और कह रही है कि,

हाँ ! मेरी बेटी वेश्या है। क्योंकि वो आज़ाद है।
खुले गगन में उड़ती है बिना परवाह किए, 
ना सोचती है ना समझती है समाज के यह झूठे नियम,
क्योंकि वो सच्ची है, अक्ल की थोड़ी सी कच्ची है 
शायद अभी भी वो बच्ची है।
वो पहनेगी जो उसे पसंद है।
समाज की परवाह किये बिना।
वो घूमेगी रात में जब तक उसका मन हो, 
बेड़ियो के बंधन में कहाँ वो बंधने वाली।
तुम उसको घूरना मत भूलना,
उसको छेड़ना मत भूलना,
वो इस समाज की "वेश्या" है,
उसको वैश्या कहना मत भूलना। 
तुम्हारी जुबान पर जो आये उसे वो कहने से मत चूकना,
क्योंकि वो ना डरेगी अब, ना रुकेगी अब,
वो आज़ाद है सिर्फ उड़ेगी अब। 
तुम क्या कहना चाहते हो वो मैं खुद कह देती हूँ, 
आज मेरी बेटी का दुःख भी तुमसे कह देती हूँ। 
नहीं निकलना चाहती वो घर से,
डरती है वो इस समाज से, इसकी कोरी-झूठी शान से। 
मर्द सर तान के जाते हैं चकलों पर
वो गलियों में भी सर झुका के चलती है। 
क्योंकि वो एक लड़की है। 
कपड़ों से कैसे कोई किसी का चरित्र जान सकता है,
सूट पहने हैवान भी मैंने देखे है। 
रोज़ करती है वो इन सबका सामना,
क्योंकि वो इस पुरुषवादी समाज की नज़र में "वेश्या" है,
हाँ ! वो वेश्या है, वो वेश्या थी और शायद वेश्या ही रहेगी। 
वो कहाँ कभी एक स्त्री थी, वो कहाँ कभी एक इंसान थी,
लेकिन एक बार तो आईने के सामने खड़े होकर  
अपनी अंतर्रात्मा से ज़रूर पूछना,
"क्या वो सच में वेश्या है?"
खुद के गुनाहों की सजा उस पर ना थोपना, 
कभी अपनी नज़र से भी तो एक बार पूछ कर देखना
तुम कमजोर हो लेकिन वो नहीं,
इसलिए तो मैं कह रही हूँ इस समाज से,
हाँ ! मेरी बेटी वेश्या है और मुझे उस पर नाज़ है। 
हाँ ! वो कल किसी की बहू भी होगी, 
और उसको भी उस पर नाज़ होगा, 
वो मिसाल बनेगी इस समाज की
क्योंकि वो आज़ाद है , क्योंकि वो आबाद है। 
हाँ ! मेरी बेटी वेश्या है और मुझे उस पर नाज़ है। 

हाँ ! मेरी बेटी...

एक "वेश्या" की माँ

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