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एक ठोकर ने दिलाया 'सिंधिया जी' को करोड़ो-अरबो रुपयों का खजाना 

सिंधिया जी के ख़जाने को देख दंग रह जाएंगे आप।  

एक ठोकर ने दिलाया 'सिंधिया जी' को करोड़ो-अरबो रुपयों का खजाना 
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आज है दिवंगत माधव राव सिंधिया जी की पुण्यतिथि  

आज है दिवंगत माधव राव सिंधिया जी की पुण्यतिथि  

आज के ही दिन 30 सितम्बर को ग्वालियर नरेश माधव राव सिंधिया जी का एक दुर्घटना में निधन हो गया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं आपको ग्वालियर किले से जुड़ा गहरा राज़ बताने जा रहा हूँ। जिस राज़ को ग्वालियर किले ने गंगाजली नाम दिया था।

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गंगाजली 

गंगाजली 
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17-18वीं शताब्दी में सिंधिया राजशाही अपने शीर्ष पर थी और ग्वालियर के किले से लगभग पूरे उत्तर भारत पर शासन कर रही थी। ग्वालियर का किला राजपरिवार के खजाने, हथियार और गोले-बारूद रखने का स्थान था। यह खज़ाना किले के नीचे गुप्त तहखानो में रखा जाता था जिसका पता सिर्फ राजदरबार के कुछ खास लोगों को था। यह खज़ाना 'गंगाजली' के नाम से जाना जाता था और इस खजाने को रखने का मुख्य उद्देश्य युद्ध, आकाल और संकट के समय में उपयोग करना था।

इस ख़जाने को खोलने के लिए होता था एक कोड जिसे कहा जाता था बीजक 

इस ख़जाने को खोलने के लिए होता था एक कोड जिसे कहा जाता था बीजक 
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सिंधिया राजशाही एक सफल, समृद्ध राजशाही थी और उसके खजाने में निरंतर वृद्धि होती रही। जब खजाने से तहखाना भर जाता तो उसे बंद करके एक खास कूट-शब्द (कोड वर्ड) से सील कर दिया जाता और नए बने तहखाने में खजाने का संग्रह किया जाता। यह खास कूट-शब्द जिसे 'बीजक' कहा जाता था, सिर्फ महाराजा को मालूम होता था। यह 'बीजक' महाराजा अपने उत्तराधिकारी को बताया करते थे और यह परम्परा चली आ रही थी। ग्वालियर किले में ऐसे कई गुप्त तहखाने थे जिन्हें बड़ी ही चालाकी से बनाया गया था और बिना 'बीजक' के इन्हें खोजना और खोलना असंभव था।

1857 के गदर ने बना दिया इन खजानों को एक राज़

1857 के गदर ने बना दिया इन खजानों को एक राज़
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यह परम्परा सालों से चली आ रही थी मगर 1857 के गदर के दौरान महाराज जयाजीराव सिंधिया को यह चिंता हुई कि किले का सैनिक छावनी के रूप में उपयोग कर रहे अंग्रेज कहीं खज़ाने को अपने कब्जे में न ले लें इसी लिए उन्होंने इसका राज़ किसी को नहीं बताया। साल 1886 में किला जब दोबारा सिंधिया प्रशासन को दिया गया, तब तक जयाजीराव बीमार रहने लगे थे। वे अपने वारिस माधव राव सिंधिया 'द्वितीय' को इसका रहस्य बता पाते, इससे पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।

एक ठोकर ने खोला करोड़ों के खजाने का दरवाजा

एक ठोकर ने खोला करोड़ों के खजाने का दरवाजा
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परन्तु माधवराव के भाग्य का सितारा अभी चमकने वाला था। एक दिन माधव राव सिंधिया किले के उस हिस्से में टहलने गए जहाँ कोई आता जाता नहीं था। रास्ते से गुज़रते हुए अचानक माधवराव का पैर फिसला, संभलने के लिए उन्होंने पास के एक खंभे को पकड़ा। आश्चर्यजनक रूप से वह खम्भा एक तरफ झुक गया और एक गुप्त छुपे हुए तहखाने का दरवाज़ा खुल गया।

ख़जाने में 2 करोड़ चाँदी के सिक्कों के साथ थे और भी कई बहुमूल्य रत्न 

ख़जाने में 2 करोड़ चाँदी के सिक्कों के साथ थे और भी कई बहुमूल्य रत्न 
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माधवराव इस अचानक हुई क्रिया से हड़बड़ा गए उन्होंने ज़ल्दी से अपने सिपाहियों को बुलाया और तहखाने की छानबीन की उस तहखाने से माधवराव सिंधिया को 2 करोड़ चांदी के सिक्कों के साथ अन्य बहुमूल्य रत्न मिले। इस खजाने के मिलने से माधवराव की आर्थिक स्थिति में बहुत वृद्धि हुई।

ज्योतिषी की मौत के बाद फिर रह गया गंगाजली एक राज़ 

ज्योतिषी की मौत के बाद फिर रह गया गंगाजली एक राज़ 
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खजाने का एक तहखाना तो मिल गया था, लेकिन गंगाजली के बाकी खजानों की खोज जाना तो अभी बाकी ही थी। लिहाजा, अंग्रेजों की गतिविधियां खत्म होने के बाद एक बार फिर महाराज माधवराव सिंधिया 'द्वितीय' ने खजाने की खोज शुरू की। इसमें उनकी मदद के लिए उनके पिता के समय का एक बुजुर्ग ज्योतिषी आगे आया। उसने महाराज के सामने शर्त रखी कि उन्हें बगैर हथियार अकेले उसके साथ चलना होगा। महाराज राजी हो गए। ज्योतिषी महाराज माधवराव 'द्वितीय' को अंधेरी भूलभुलैयानुमा सीढ़ियों से नीचे ले जाता हुआ 'गंगाजली' के एक तहखाने तक ले भी गया था। इसी दौरान महाराजा को अपने पीछे कोई छाया नजर आई, तो उन्होंने बचाव में अपने राजदंड से अंधेरे में ही प्रहार किया और दौड़ कर ऊपर आ गए। ऊपर खड़े सैनिकों को साथ ले कर जब वे वापस आए, तब उन्हें पता चला कि गलती से उन्होंने ज्योतिषी को मार दिया है। लिहाजा, वह एक बार फिर वो बाकी खज़ाने से वंचित रह गए।

अंग्रेज कर्नल बैनरमेन की मदद से सर माधव राव द्वितीय को मिला था करोड़ों का खज़ाना।  

अंग्रेज कर्नल बैनरमेन की मदद से सर माधव राव द्वितीय को मिला था करोड़ों का खज़ाना।  
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माधव राव 'द्वितीय' जब बालिग हुए, तब तक खानदान में 'गंगाजली' खजाने को लेकर और बेचैनी रही। इसी दौरान अंग्रेज कर्नल बैनरमेन ने गंगाजली की खोज में उनकी सहायता का प्रस्ताव दिया। सिंधिया खानदान के प्रतिनिधियों की निगरानी में कर्नल ने 'गंगाजली' की बहुत तलाश की, लेकिन पूरा खजाना नहीं मिल सका। कहा जाता है कि पूरा खजाना तो नहीं मिला, लेकिन जो भी मिला, उसकी कीमत उन दिनों करीब 62 करोड़ रुपए आंकी गई थी। कर्नल बैनरमेन ने इस तहखाने को देख कर अपनी डायरी में इसे 'अलादीन का खजाना' लिखा था। कहा जाता है कि गंगाजली के कई तहखाने आज भी महफूज हैं और सिंधिया घराने की पहुंच से बाहर हैं।

मेरे देश को सोने की चिड़िया यूँही नहीं कहा जाता। हाँ,यह बात और है यह चिड़िया राज़ घराने के पिंजरे में बंद है। अगर इस धन का सही तरीके से उपयोग किया जाये तो दुनिया के मानचित्र पर भारत का नक्शा स्वर्ण रेखाओं में अंकित हो जाएगा। 

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