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टाटा ग्रुप ने क्यों कहा सायरस मिस्त्री को अलविदा?

मिस्त्री से क्यों नाराज़ हुआ टाटा समूह। 

टाटा ग्रुप ने क्यों कहा सायरस मिस्त्री को अलविदा?
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"अपने बेटे को मत कहो सूरज, सर चढ़ेगा तो गज़ब ढाएगा" 

सायरस मिस्त्री और रतन टाटा में भी तो कुछ ऐसा ही रिश्ता था, बाप-बेटा ना सही लेकिन घनिष्ठता तो बहुत थी। टाटा ग्रुप के "सूरज" ही थे सायरस, जिन्हें रतन टाटा ने खुद 3 साल सोच विचार करने के बाद चुना था। हालाँकि यह अलग बात है कि वे अपनी मर्ज़ी से अस्त नहीं हुए बल्कि उन्हें अस्त होना पड़ा और अब आगे क्या गज़ब होगा यह तो ऊपर वाला ही जाने। 

ख़ैर आप में से कई लोग इस खबर से भली-भांति परिचित होंगे कि सायरस मिस्त्री अब टाटा के चैयरमैन नहीं रहे हैं। रतन टाटा ने अंतरिम रूप से दोबारा बागडोर संभाल ली है। कॉरपोरेट जगत में, कब क्या हो जाए यह कोई नहीं कह सकता। ज़ाहिर सी बात है सायरस की intelligence और business skill पर शक करना सही नहीं होगा, इस फैसले के पीछे और भी बहुत से कारण रहे होंगे। लेकिन फिर भी कई लोगों का मानना है कि कंपनी, घाटे में जा रही थी, इसलिए ऐसा कदम उठाया गया है। अभी तक इस बात का मुख्य कारण सामने नहीं आया है। 

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आओ तो हम आपका स्वागत करेंगे 

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यह खबर पूरे मिडिया इंडस्ट्री में आग की तरह फ़ैल चुकी है कि सायरस मिस्त्री अब टाटा ग्रुप के चैयरमैन नहीं रहे। यदि आप अपनी याददाश्त पर थोड़ा ज़ोर डालेंगे तो आपको 2006 का समय याद आएगा कि किस तरह सायरस को चैयरमैन बनाए जाने पर पूरा मीडिया सवाल उठा रहा था।

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जाने पर हम दरवाज़े का रास्ता भी दिखा देंगे  

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लेकिन यह भी सच है कि कॉर्पोरेट जगत में कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। जितनी तेज़ी से सायरस को चेयरमैन का पद सौंपा गया था उतनी ही तेज़ी से उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया गया है। मतलब यही हुआ ना "आओ तो घर और जाओ तो दरवाज़ा"। 

आपको Flashback में लेकर चलते है 

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बात उस समय की है जब देश "आर्थिक मंदी" के दौर से गुज़र रहा था और रतन टाटा ने युवा वर्ग के सामने "Be Your own Man" का उदहारण पेश करते हुए सायरस मिस्त्री को चेयरमैन घोषित किया था। चूँकि बात आर्थिक मंदी की चल रही है तो बता दूँ कि आर्थिक मंदी के समय बहुत सी "MNC" (बहुराष्ट्रीय कंपनी) विदेश जाकर अपना बिज़नेस का पलड़ा भारी करने में लगे हुए थे।

रतन टाटा ने लिए थे कुछ अहम फैसले 

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रतन टाटा ने भी ज़ोरों-शोरों से अपना बिज़नेस देश के बाहर विस्तृत किया और इसी स्ट्रेटजी पर आगे बढ़ते हुए, 50 साल काम करने के बाद, सन 2012 में अपने काम की बाग-डोर सायरस मिस्त्री को सौंप दी। शुरूआती दिनों में तो मिस्त्री भी रतन जी की देख-रेख में काम किया करते थे लेकिन वो कहते हैं ना "मैंने दुनिया को सिखाई है अदा चलने की, और अपने अपनों की रफ़्तार से ही डर जाता हूँ"

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सायरस भी शुरुआत में चले रतन टाटा के नक़्शे कदम पर 

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पहले-पहल तो सिलसिला कुछ ऐसा ही था कि सायरस पूरी तरह से रतन जी की देख-रेख में काम कर रहे थे। लेकिन बात तब बिगड़ गई जब सायरस खुद अपने फैसले लेने लगे। जैसे मैंने आपको बताया कि आर्थिक मंदी के समय रतन टाटा ने बाहरी देशों में अपना बिज़नेस फैलाया, इसके विपरीत सायरस ने यह फैसला लिया कि जो बाहरी कंपनीज़ मुनाफा नहीं दे रही हैं उन्हें बंद कर देना चाहिए। सायरस का यह फैसला कंपनी के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ।

Ex-chairman के अलावा सायरस कौन हैं?

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खैर टाटा ग्रुप के चेयरमैन होने के अलावा, मेरा मतलब है Ex-चेयरमैन होने के अलावा सायरस कौन हैं? यह भी शायद आप जानते ही होंगे। सायरस, आयरलैंड के सबसे अमीर परिवार और एक बड़े उद्योगपति पालोनजी मिस्त्री के छोटे बेटे हैं। इससे पहले सायरस शापूरजी पालोनजी ग्रुप के निदेशक थे जिनके मार्गदर्शन में कंपनी का टर्न ओवर दो करोड़ पाउंड से करीब देड़ लाख करोड़ पाउंड हो गया था।

आगे-आगे देखो होता है क्या

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इस मुद्दे को लेकर अभी तक रतन टाटा की तरफ से कोई विवरण नहीं दिया गया है और दूसरी ओर शापूरजी पालोनजी ग्रुप भी चुप्पी साधे हुए है। लेकिन बताया जा रहा है की मामला कोर्ट तक पहुँचने की कगार पर है। फ़िलहाल तो यही कहा जा सकता है "All The Best to Both of You".

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