एक दिया उन शहीदों के नाम जो रोशन कर गए हमारी दिवाली

चलो इस दीपावली कुछ ऐसा करें। 

एक दिया उन शहीदों के नाम जो रोशन कर गए हमारी दिवाली
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दिल में आज कल एक टीस सी उठ रही है, देश के ऐसे हालत में मैं कैसे कोई त्यौहार मना सकता हूँ।एक तरफ जहाँ सरहद पर गोले दागे जा रहे हैं वहाँ दूसरी तरफ मैं कैसे कोई पटाखा जला सकता हूँ।एक तरफ जहाँ किसी आँगन का कोई चिराग बुझ गया हो वहीँ दूसरी तरफ मैं कैसे अपने आँगन को चिरागों से रोशन कर सकता हूँ।मैं जानता हूँ वो सरहद पर जो खड़ा अपने सीने पर गोलियाँ झेल रहा है वो इसी लिए झेल रहा है ताकी हम खुशियाँ मना सके, मगर उसे खून की होली खेलता देख मैं कैसे दीवाली मना सकता हूँ।     

क्यों न इस बार कुछ ऐसा करें 

क्यों न इस बार कुछ ऐसा करें 

हम धूम-धाम से दीवाली मनाते हैं, हर घर दियों से जगमगाता है। अमावस्या की काली घनेरी रात के होते हुए भी अँधेरा कोसों दूर रहता है।तो क्या इस दीवाली एक दिया हम उन शहीदों के नाम नहीं जला सकते जो असल मायने में सारा अँधियारा खुद सह कर हमारे जीवन में रोशनी लाते हैं।   

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एक पल के लिए सोचो उनके घरों पर क्या बित रही होगी  

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किसी महान कवी ने अपनी इन पंक्तियों में उन शहीदों के परिवार के दर्द को अपने शब्दों में बयान करने की कोशिश की है "सुख भरपूर गया, मांग का सिंदूर गया, नन्हे नो निहालों की लंगोतियाँ चली गई। बाप की दवाई गई, भाई की पढाई गई, छोटी-छोटी बेटियों की चोटियाँ चली गई।ऐसा विस्फोट हुआ जिस्म का पता ही नहीं पुरे ही शरीर की बोटियाँ चली गई। आपके लिए तो एक आदमी मरा है साहब मेरे घर की तो रोटियाँ चली गई।"     

क़र्ज़ है उनका हमारे उपर 

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आज मुस्कुराने में भी होंठो पर भार महसूस हो रहा है क्योंकि यह मुस्कुराहट उन शहीदों के बलिदान से क़र्ज़ में मिली है।मैं जानता हूँ एक दिया जलाने से या चंद मिनिट मौन रख लेने से उस क़र्ज़ को चुकाया नहीं जा सकता मगर मैं यह भी जानता हूँ कदम चाहे छोटा ही क्यों न हो वह बड़े से बड़ा बदलाव करने के लिए सक्षम होता है।इस एक दिये को जला कर आप और मैं उसी बदलाव का हिस्सा बनेंगे।  

शहीद कभी मरता नहीं है 

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अगर दुनिया में कोई सबसे बड़ा त्याग है तो वह है शहादत, यह सबसे बड़ा दान भी है।अपनी मातृभूमी के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देने का हुनर सिखाते हैं शहीद।खुद को बलि-बेदी पर न्यौछावर कर देना ही शहादत की असली परिभाषा कहलाती है। कहा जाता है समर्पण, त्याग,दान तभी देना चाहिए जब उसकी जरुरत हो जैसे हमारे शहीदों ने अपने प्राणों की आहुती तब दी जब राष्ट्र को उसकी आवश्यकता थी आज वह मौका हमे भी मिला है।   

यह सिर्फ मौसमी देश भक्ति नहीं है 

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मेरा सभी से यह करबद्ध निवेदन है कि इसे सिर्फ मौसमी देशभक्ति न समझा जाए। अपने आँगन में जब आप शहीदों के नाम का एक दिया जलाओगे तब उस दिए की रोशनी सिर्फ आपके आँगन तक ही सिमित नहीं होनी चाहिए बल्कि उसका प्रकाश आपके मन के उस अँधेरे कौने में भी पड़ना चाहिए जिस कौने में राष्ट्र भक्ति अँधेरी कौठरी में पड़ी है।   

जब भी मौका मिले इसे जाने न दें 

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हमारा यह एक छोटा सा प्रयास एक शहीद के परिजनों का धन्यवाद कहता है, शहीद के बच्चों में उसके पिता के प्रति सम्मान बढ़ाता है और संभव है आज शहीदों का अनुश्रवण कर सीमा की रक्षा के लिए एक नहीं दस कदम आगे बड़े। सैनिक और शहीद के प्रति सम्मान प्रकट करने का जब भी अवसर मिले, उसे निभाया जाए तो फिर ना किसी आक्रांता का भय होगा और ना किसी भेदिए का डर।

एक दिया उन शहीदों के नाम 

एक दिया उन शहीदों के नाम 
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इस दीवाली एक दिया उन शहीदों के नाम ताकी हमारे अन्दर एक आज़ादी की लो जलती रहे।एक दिया इस लिए ताकि वह लो हमसे कहती रहे कि "तुम न सोचो यह स्वाधीनता तुम्हें यूँ ही मिली है, हर कलि इस बाग़ की कुछ खून पी कर ही खिली है।"    

जय हिन्द....जय हिन्द की सेना!