ज़िंदगी भर शराब को न छूने वाले हरिवंशराय बच्चन जी ने ऐसे लिखी थी मधुशाला

मधुशाला से जुड़ा एक अनोखा किस्सा। 

ज़िंदगी भर शराब को न छूने वाले हरिवंशराय बच्चन जी ने ऐसे लिखी थी मधुशाला
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मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।

                                                            -हरिवंश राय बच्चन 

आज लिखते हुए खुद को बड़ा असहज महसूस कर रहा हूँ, क्योंकि आज उनके बारे में लिखने का अवसर मिला है जिनसे मुझे लिखने की प्रेरणा मिली है। एक हिंदी शिक्षक के घर जन्म लेने की वजह से, बच्चन साहब से मेरा परिचय बचपन में ही हो गया था। बचपन में जब मैंने सर्वप्रथम मधुशाला पढ़ी, तब मुझे लगा था यह हर वक्त नशे में धुत रहने वाले कोई कवी होंगे। भला मधुशाला के इतने गुण 'मदिरा' पीने वालों के सिवाय और कौन जान सकता है? कई बार पिताजी से इस विषय पर चर्चा करनी चाही, मगर संकोचवश कभी पूछ नहीं पाया। पिछले दिनों बच्चन साहब का एक संस्मरण पढ़ा, तब मुझे पता चला कि उन्होंने मेरे मन में चल रहे सालों पुराने सवाल का सदियों पहले जवाब दे दिया था। तो लीजिये पढ़िए बच्चन साहब का क्या कहना था इस बारे में। 

ज़िंदगी ही एक नशा है! 

ज़िंदगी ही एक नशा है! 

मधुशाला के बहुत से पाठक और श्रोता एक समय समझा करते थे, कुछ शायद अब भी समझते हों, कि इसका लेखक दिन-रात मदिरा के नशे में चूर रहता है। वास्तविकता यह है कि 'मदिरा' नामधारी द्रव से मेरा परिचय अक्षरशः बरायनाम है। नशे से मैं इंकार नहीं करूँगा। जिंदगी ही एक नशा है। और भी बहुत से नशे हैं। अपने प्रेमियों का भ्रम दूर करने के लिए मैंने एक समय एक रुबाई लिखी थी।

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स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला

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स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला।

स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला।

पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,

स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

कायस्थ, पीने के लिए प्रसिद्ध हैं 

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फिर भी बराबर प्रश्न होते रहे, आप पीते नहीं तो आपको मदिरा पर लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है? प्रश्न भोला था, पर था ईमानदार। एक दिन ध्यान आया कि कायस्थों के कुल में जन्मा हूँ, जो पीने के लिए प्रसिद्ध हैं, या थे। चन्द बरदाई के रासों का छप्पय याद भी आया। सोचने लगा, क्या पूर्वजों का किया हुआ मधुपान मुझपर कोई संस्कार ना छोड़ गया होगा! भोले-भाले लोगों को बहलाने के लिए एक रुबाई लिखी

मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला

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मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढाला,

मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,

पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,

मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

अमोढ़ा के पांडे कहलाते हैं

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पर सच तो यह है कि हम लोग अमोढ़ा के कायस्थ हैं जो अपने आचार-विचार के कारण अमोढ़ा के पांडे कहलाते हैं, और जिनके यहाँ यह किवदंती है कि यदि कोई शराब पियेगा तो कोढ़ी हो जाएगा। यह भी नियति का एक व्यंग्य है कि जिन्होंने मदिरा न पीने की इतनी कड़ी प्रतिज्ञा की थी, उनके ही एक वंशज ने मदिरा की इतनी वकालत की। 

हिंदी साहित्य के दीपक हैं बच्चन साहब

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"अलग-अलग विद्वानों ने अपने अनुसार मधुशाला को अपने अर्थों में गढ़ा है, मगर मैंने मधुशाला में जीवन का असली सार पढ़ा है।" मधुशाला से जब मेरा पुनः कुछ सालों बाद मिलना हुआ, तब समझ में आया मधुशाला में तो बच्चन साहब ने जीवन का सम्पूर्ण सार ही लिख दिया है। सच-मुच जीवन को किसी ने अगर सच्चे शब्दों में लिखा है तो वह बच्चन साहब ने ही लिखा है। हिंदी साहित्य के अमर दीपक को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम!

क्या आप हरिवंश राय बच्चन जी की ज़िन्दगी से जुड़े और भी किस्से जानना पसंद करेंगे?