पौराणिक काल में गाय ने दिया था मनुष्य के बच्चे को जन्म 

गाय के गर्भ में रहे इस बच्चे का नाम है 'गौकर्ण'। 

पौराणिक काल में गाय ने दिया था मनुष्य के बच्चे को जन्म 
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ये कथा पौराणिक दिव्य काल की है। तब उस काल में तुंगभद्रा नदी के किनारे एक 'रम्य' नगर था। उस नगर में आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। आत्मदेव की पत्नी बहुत सुन्दर लेकिन हठी थी। आत्मदेव की कोई संतान नहीं थी। जब आत्मदेव और उसकी पत्नी की यौवन उम्र ढलने लगी और उनकी कोई संतान न हुई तो आत्मदेव दुखी होकर घर से चल दिए। चलते चलते वह थक गए और एक तालाब के किनारे जा कर बैठ गए।

उसी समय तालाब के पास एक सन्यासी आये और आत्मदेव को दुखी देख कर बोले...      

आत्मदेव लौटे पत्नी के पास 

आत्मदेव लौटे पत्नी के पास 

"हे ब्राह्मण तुम्हारे भाग्य में संतान सुख नहीं है, लेकिन मैं अपने योग बल से एक संतान प्रदान करूँगा।" सन्यासी ने आत्मदेव को एक फल दे कर कहा "योगशक्ति से भरे इस फल को अपनी पत्नी को खिला देना।" आत्मदेव प्रसन्नता पूर्वक अपनी पत्नी के पास गया और सारा वृतांत सुनाकर अपनी पत्नी को वह फल खाने को दे दिया।   

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गाय को खिला दिया फल 

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वह फल खाने के पहले पत्नी ने सोचा कि "यदि मैं इस फल को खा लूँगी तो मेरे गर्भ में बच्चा आ जाएगा। मेरा पेट फूल कर बड़ा हो जाएगा और नौ महीने तक कष्ट सहन करना पड़ेगा। हो सकता है प्रसव के बाद मेरे प्राण ही निकल जाये। बच्चे का लालन पालन कैसे कर पाऊँगी।" यह सब सोच कर उसने यह फल गाय को खिला दिया।   

गाय ने जन्मा बच्चा 

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ये बात जब आत्मदेव की पत्नी ने अपनी छोटी बहन को बताई, तो उसने अपना बच्चा अपनी बड़ी बहन को देने का निश्चय कर लिया। और जब छोटी बहन को पुत्र हुआ तो वह अपनी बड़ी बहन को अपना पुत्र दे गयी। जिसे आत्मदेव की पत्नी अपना बच्चा बताने लगी।

कुछ समय पश्चात एक गाय के गर्भ से एक बहुत सुंदर और तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। चूँकि उस बालक का जन्म गाय के गर्भ से हुआ था अतः उसे 'गोकर्ण' नाम दिया गया।  

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