केवल 18 साल की उम्र में देश के लिए हँसते-हँसते शहीद हो गया था यह युवा क्रांतिकारी

16 साल की उम्र में किया पहला विस्फोट।

केवल 18 साल की उम्र में देश के लिए हँसते-हँसते शहीद हो गया था यह युवा क्रांतिकारी
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स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र जब भी होता है तो सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आजाद, रानी लक्ष्मीबाई और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जैसे गिने-चुने यौद्धाओं का ही नाम आता है। 

बेशक देश की आजादी में इन बड़े सेनानियों की अहम भूमिका रही है। मगर आजादी के लिए दर्जनभर लोगों ने नहीं बल्कि हजारों-लाखों लोगों ने मिलकर लड़ाई लड़ी थी।

15 अगस्त 2017 को देश को आजाद हुए 70 बरस पूरे हो जाएंगे। बावजूद इसके आज भी हम कई स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। वो हमेशा से गुमनामी के अंधेरे में रहे हैं या फिर उनके बारे में बहुत कम बात की जाती है।  

आज हम आपको ऐसे ही एक गुमनाम हीरो की कहानी सुनाएंगे। यह गुमनाम हीरो खुदीराम बोस देश की आजादी के लिए 18 साल की उम्र में फांसी के फंदे पर झूल गया था। इतनी कम उम्र में भी देश के लिए बलिदान दे देना कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह युवा नायक वाकई बहुत बहादुर रहा होगा। 

आइए आपको सुनाते हैं खुदीराम बोस की बहादुरी का एक किस्सा।

110वीं बरसी 

110वीं बरसी 

11 अगस्त 2017 को ही खुदीराम बोस की 110वीं पुण्यतिथि मनाई गई। इस दिन बिहार के मुजफ्फरपुर में इस वीर को कई स्थानों पर श्रद्धांजलि दी गई। 

चलिए अब जानते हैं, खुदीराम बोस की कहानी।

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पश्चिम बंगाल में हुआ जन्म 

पश्चिम बंगाल में हुआ जन्म 

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी गांव में हुआ था। 

नौवीं कक्षा में छोड़ दी पढ़ाई 

नौवीं कक्षा में छोड़ दी पढ़ाई 

खुदीराम बोस के मन में बचपन से ही देश को आजाद कराने की आग जलने लगी थी। पढ़ाई बीच में छोड़कर वो स्वदेसी आंदोलन में भाग लेने निकल पड़े। इसके बाद बोस रिवोल्यूशनरी पार्टी का हिस्सा बन गए।

बने आंदोलन का हिस्सा 

बने आंदोलन का हिस्सा 

1905 में बंगाल में विभाजन को लेकर 'बंग भंग' आंदोलन जोरों पर था। खुदीराम बोस 15-16 वर्ष की कच्ची उम्र में इस बड़े आंदोलन का हिस्सा बने।

किया बम विस्फोट 

किया बम विस्फोट 

6 दिसंबर 2017 को 18 वर्ष की उम्र में बोस ने यह कारनामा किया। उन्होंने कई पुलिस स्टेशन और सरकारी दफ्तरों को निशाना बनाया। इसके बाद उन्हें निर्दयी अंग्रेज अधिकारी को मारने का काम सौंपा गया। बोस इस काम को प्रफ्फुल चंद चाकी के साथ मिलकर अंजाम देने वाले थे।

किया बम विस्फोट 

किया बम विस्फोट 

खुदीराम अपने साथी के साथ मुजफ्फरपुर पहुंचे। इसके बाद उन्होंने मौका देखकर किंग्सफोर्ड की बग्गी पर हमला भी किया। मगर उस बग्गी में तो किसी और ब्रिटिश अफसर की पत्नी और बच्ची थीं, जिनकी इस विस्फोट में मृत्यु हो गई।

भगवत गीता को रखा साथ 

भगवत गीता को रखा साथ 
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इस हादसे के बाद बोस को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी के तख्ते पर लटकाया गया। खुदीराम को फांसी चढ़ाने वाले मजिस्ट्रेट ने खुद ही कहा कि खुदीराम बिल्कुल किसी शेर के बच्चे की तरह निडर होकर फांसी के तख्ते पर चढ़ गए। इस वक्त खुदीराम 18 साल, 8 महीने और 8 दिन के थे।

ऐसे मिला सम्मान 

ऐसे मिला सम्मान 

खुदीराम बोस के शहीद होने के बाद कई दिनों तक स्कूल और कॉलेज बंद रहे। इतना ही नहीं उनके सम्मान में लोग ऐसी धोती पहनने लगे जिसके किनारे पर खुदीराम लिखा होता था।

सम्मान में बना गाना

खुदीराम बोस की 18वीं पुण्यतिथि पर उनके सम्मान में बांग्ला लेखक पीताम्बर दास ने बांग्ला गाना "एक बार विदाई दे माँ" लिखा और कंपोज किया था। यह गीत वाकई भावुक कर देने वाला है। 

'मैं खुदीराम बोस हूँ'

'मैं खुदीराम बोस हूँ'

खुदीराम बोस की वीरता और उनकी जिंदगी के अनछुए पहलुओं पर आधारित एक फिल्म भी बन रही है। इस फिल्म के जल्दी ही रिलीज होने के आसार है।

क्या आपको खुदीराम बोस से जुड़ी कोई और कहानी याद आ रही है?