जब सती के प्रेम में इस तरह डूब गए थे शिव, 'वैलेंटाइन डे' के बहाने जानिए महादेव की प्रेम कहानी

सती से बिछड़ कर शक्तिहीन हो गए थे शिव। 

जब सती के प्रेम में इस तरह डूब गए थे शिव, 'वैलेंटाइन डे' के बहाने जानिए महादेव की प्रेम कहानी
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वैलेंटाइन वीक चल रहा है। प्यार का त्यौहार आने में केवल 1 दिन बाकी है। हर कोई प्यार की तलाश में है। जल्द से जल्द अच्छा लाइफ पार्टनर पाकर अपनी जिंदगी को प्यार से सराबोर कर लेना चाहता है। खैर! लाइफ पार्टनर मिलना कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं। लेकिन एक ऐसा लाइफ पार्टनर मिलना जो ना केवल आपको अपना नाम दें बल्कि आपको अपने आप में बसा लें। मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है।       

गौरी-शंकर, उमा-महेश, शिव-पार्वती, भैरव-काली ये सभी हमारे भोले-भंडारी और अर्धनारीश्वर कहलाने वाले महादेव के नाम हैं। अगर आपने कभी गौर किया हो तो भोलेभंडारी के हर नाम के साथ उनकी पत्नी का नाम जोड़ा जाता है। अगर उनकी लव लाइफ पर ध्यान दिया जाए तो हम पाएंगे कि किस तरह शिवजी की जिंदगी प्यार से भरपूर रही है। हमारी तरह उनकी लव लाइफ में भी कई उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा है।

आज हम आपको शिव जी की लव लाइफ के बारे में बताते हैं। तो आइये जानते हैं।

1. शिव और सती 

1. शिव और सती 

सबसे पहले हम महादेव और सती की मुलाकात के बारे में बात करते हैं। सती, ब्रह्मा के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष की पुत्री थी। सती ने अपने पिता दक्ष की इच्छा के विरुद्ध जाकर भोलेनाथ से विवाह किया था। इसकी वजह से प्रजापति दक्ष उनसे घृणा करने लगे थे।

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यज्ञ में पहुंची सती

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एक बार प्रजापति दक्ष ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। मगर इस यज्ञ में अपनी पुत्री सती और दामाद को निमंत्रण नहीं भेजा। हालांकि फिर भी पिता के मोह में सती बिन बुलाए उस यज्ञ में जा पहुंची। लेकिन पुत्री के आने पर दक्ष ने उपेक्षा का भाव प्रकट किया और सती के साथ-साथ शिव के बारे में भी अपमान से भरे शब्द कहे।

सती ने किया देहत्याग 

सती ने किया देहत्याग 
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अपने पति शिव के बारे में अपमान भरे शब्द सुनकर सती का मन कुंठा से भर गया। इस अपमान की वजह से वो उसी यज्ञ में कूद गई और अपने प्राण त्याग दिए। जब शिव को ये बात मालूम हुई तो वो सती के जले हुए शरीर के साथ तांडव नृत्य करने लगे। इसे देखकर तीनों लोक के लोग व्याकुल हो गए। शिव के इस रूप को देख भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अलग-अलग टुकड़े कर दिए। यही आज शक्ति पीठ के रूप में विराजमान हैं।

2. शिव और माँ पार्वती 

2. शिव और माँ पार्वती 
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उसके बाद सती में हिमालय के राजा हिमवान और मैनावती के घर जन्म लिया। चूंकि सती हिमालय के राजा की पुत्री के रूप में जन्मी थीं, अतः उनका नाम पार्वती यानी पर्वतों की रानी रखा गया। पार्वती तो बचपन से ही शिव को अपना पति मानने लगी थीं। और तो और शिव को पाने के लिए वो वन में तपस्या करने चली गई।

प्रेम की परीक्षा 

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पार्वती ने कई सालों तक वन में तप किया। तब भोलेनाथ ने पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए देवर्षी को उनके पास भेजा। तब देवर्षी ने पार्वती को ये समझाने का प्रयास किया कि शिव औघड़ हैं। उनके साथ तुम कभी खुश नहीं रहोगी। लेकिन पार्वती अपने फैसले पर अडिग रहीं और शिव के लिए अपना प्रेम जाहिर करती रहीं। 

पार्वती के साथ विवाह 

पार्वती के साथ विवाह 
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पार्वती के इस अगाध प्रेम को देखने के बाद शिव काफी प्रसन्न हुए और वे जान गए कि पार्वती को अपना सती स्वरूप अभी भी याद है। इसके बाद शिव और पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त निश्चित किया गया। शिव अपने अघौरी रूप में ही बारात लेकर पहुंचे और पार्वती से विवाह कर उन्हें कैलाश पर्वत ले आए।

3. शिव और माँ उमा  

3. शिव और माँ उमा  
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माँ पार्वती ही उमा थीं या उमा नामक कोई और देवी थीं ये जानना बहुत जरूरी है। सामान्य तौर पर उमा को पार्वती का ही रूप माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब शिव, महेश हुए तो पार्वती ने भी उमा का रूप धारण कर लिया था।    

भूमि की देवी 

भूमि की देवी 
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उमा को भूमि की देवी कहा जाता है, जो थोड़ी आराधना करने पर ही जल्दी प्रसन्न हो जाती है। इसके अलावा उमा को उनके सरल हृदय और दयालुता की वजह से भी जाना जाता है।

उत्तराखंड में हुई उत्पत्ति 

उत्तराखंड में हुई उत्पत्ति 
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पार्वती का रूप कहलाने वाली देवी उमा की उत्पत्ति को उत्तराखंड की मानी जाती है। जबकि कापरिपट्टी के शिव मंदिर को उनका ससुराल माना जाता है।  

4. शिव और माँ काली 

4. शिव और माँ काली 
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भगवान शिव को चौथी बार पति के रूप में पाया माँ काली ने। माँ काली का जन्म दानवों का संहार करने के लिए हुआ था। उस काल में एक ऐसे दानव का जन्म हुआ, जिसके रक्त की एक बून्द भी जमीन पर गिर जाए तो उससे हजारों दानवों का जन्म हो जाता था। ऐसी स्थिति में उस दानव का संहार करना किसी देवता के वश में नहीं था। तब माँ काली ने उस दानव को मारकर तीनों लोक को बचाया था।

महादेव के सीने पर पैर 

महादेव के सीने पर पैर 
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लेकिन उस दानव को मारने के बाद भी महाकाली का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था। ऐसे में भगवान शंकर उनकी राह में लेट गए और गलती से माँ काली ने अपना पैर भगवान शिव के सीने पर रख दिया। इससे उनका गुस्सा शांत हो गया।

पाप का प्रायश्चित 

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जब माँ काली को अपने द्वारा हुई इस भूल की जानकारी मिली तो उन्हें इसका पश्चाताप हुआ। इस महापाप की वजह से काली को कई वर्षों तक हिमालय के जंगल में भटकना पड़ा। कई साल तपस्या के बाद महादेव ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें इस पाप से मुक्ति दिलवाई।
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क्या आप मानते हैं कि भगवान शिव और पार्वती का जीवन हर जोड़े के लिए एक मिसाल है?